October 26, 2020

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THE HINDI FACTS

samprada singh

एक छोटी शुरुआत से 30 देशों का सफर-samprada singh

एक छोटी शुरुआत से 30 देशों का सफर-samprada singh

सच ही कहा गया है कि यदि लक्ष्य प्राप्ति को लेकर दृढ़ता और अपनों का साथ हो तो फिर मंजिल को पाने की राह में आने वाली तमाम बाधाएं खुद-बखुद अपना रास्ता मोड़ लेती है ।

कहते है अगर इंसान कुछ करने की ठान ले तो उसे कोई नही रोक सकता है।

वह कुछ भी कर सकता है। वह इस संसार का सिरमौर बन सकता है अगर उसमे दृढ़संकल्प हो और हार न मानने का जुनून हो । कुछ ऐसी ही कहानी है सम्प्रदा सिंह की जिन्होंने अपनी एक छोटी सी दवाई की दुकान से 30 अलग देशों में लगभग 74000 करोड़ रुपये का एक विशाल साम्राज्य खड़ा किया है । ये कहानी है उनके संघर्ष की जिंसने उन्हें जमीन की सतह से आकाश की ऊंचाइयों तक पहुचा दिया ।

संप्रदा सिंह (samprada singh) का जन्म बिहार के जहानाबाद जिले के एक छोटे से गांव ओकरी में हुआ था । इनका बचपन से ही डॉक्टर बनने का सपना था लेकिन घर किआ आर्थिक स्तिथि ऐसी नही थी कि ये उस सपने को पूरा कर सके । फिर भी इनके इस सपने को मंजिल तक पहुचाने के लिए इनके पिता ने आगे की पढ़ाई करने के लिए इन्हें पटना भेजा लेकिन यहां पर इन्हें सफलता नही मिली और इनके डॉक्टर बनने का सपना अधूरा ही रह गया ।

इसके बाद इन्होंने अपने परिवार की आर्थिक मदद करने के उद्देश्य से 1953 में पटना में एक छोटी दवा की दुकान की शुरुआत की । जल्दी ही इनकी मिलसारिता और लोगो को अपना बनाने की कला से जल्द ही इनके काम को बहुत बड़ा बना दिया ओर जल्द ही इन्होंने 1960 में मगध फार्मा (magadh pharma) के नाम से एक दवा डिस्ट्रीब्यूटर फर्म डाली । जल्द ही ये कई बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के डिस्ट्रीब्यूटर बन गए ।

हमेशा कुछ बड़ा करने का सपना देखने वाले संप्रदा सिंह ने अब स्वयं दवा निर्माता बनने का फैसला लिया और मुम्बई आकर इन्होंने 1973 में एलक्म लेबोरेटरी की स्थापना की । शुरुआत के पांच साल इन्होंने काफी संघर्ष किया किया ।

लेकिन जब किस्मत देती है तो छप्पर फाड़ कर देती है ऐसा ही कुछ इनके साथ हुआ जब इनकी लेबोरेट्री ने एक एन्टी बायोटिक कम्फोटेक्सिम का जेनेरिक वर्जन टेक्सिम बनाने में सफलता हासिल की । हुआ ये की इनकी प्रतिस्पर्धी फ्रंच कम्पनि ने इन्हें छोटा स्पर्धी मानकर इन्हें गंभीरता से नही लिया और यही पर इन्होंने बाजी मार ली । इसके बाद इनकी बनाई दवा टेक्सिम ने बाजार में अपना झंडा गाड दिया ।

क्योकि इनके द्वारा उपलब्ध करवाई गई दवा काफी किफायती मूल्य की दवा थी । एलक्म लेबोरेटरी आज फार्मास्युटिकल और न्यूट्रास्युटिकल बनाती है। आज इस कम्पनी का कारोबार विश्व के 30 देशों में फैला हुआ है ।

साल 2017 में फोर्ब्स इंडिया ने samprada singh को  विश्व के 100 सबसे धनी लोगो की सूची में 52 वा स्थान दिया था । सम्प्रदा सिंह ये उपलबड़ी हासिल करने वाले पहले बिहारी थे। साल 2017 में संप्रदा सिंह ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया लेकिन उन्होंने अपने जीवन से आने वाली अनेको पीढ़ी के लिए एक आदर्श प्रस्तुत किया है कि सपने हमेशा बड़े ही देखने चाहिए । अगर हम सपने बड़े नही देखगे तो कुछ भी बड़ा नही कर सकते है ।

इनके जीवन से जो सबसे बड़ी सीख मिलती है वह ये है कि हमेशा सबसे बड़े प्रतिद्वंदी को टक्कर देना चाहिए क्योंकि वह आपको सबसे छोटा मानकर आपको नजरअंदाज कर देगा और आपके रास्ते की सभी मुश्किले मिट जाएंगी ।

इसके फलस्वरूप आप वह कर पाएंगे जिसका अन्दाज लगाना भी मुश्किल होगा और दुनिया आपके धमाके को देखकर दंग रह जायेगी फिर आपको सफलता की गगनचुंबी चोटी जो छूने के कोई नही रोक पायेगा ।

यदि दृढ़ संकल्पित होकर लक्ष्य का पीछा किया जाए तो सफलता अवश्य मिलेगी।

 

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