October 29, 2020

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THE HINDI FACTS

Ravindra Jagtap

जीरो से 500 करोड़ तक का सफर-Ravindra Jagtap

जीरो से 500 करोड़ तक का सफर-रविन्द्र जगताप(Ravindra Jagtap)

1947 में भारत की आजादी के समय देश मे काफी उथल पुथल हुई । उस समय की परिस्थिति आज की परिस्थितियों से बहुत अलग थी । उस समय गरीबी का आलम इस कदर था कि शिक्षा पूरी कर पाना एक तरह से नामुमकिन था , नौकरियां भी नही मिलती थी । आजाद हुए भारत मे काफी कुछ बदल रहा था । काफी कम्पनियां बन रही थी तो काफी कंपनियां बन्द भी हो रही थी ।

उस समय आम आदमी ने जो संघर्ष किया है उसे आज भुलाया नही जा सकता है । आज की कहानी ऐसी ही परिस्थितियों का सामना करते हुए एक बहुत बड़ा सम्राज्य खड़ा करने काले व्यक्ति रविन्द्र जगताप(Ravindra Jagtap) की है। इनका जन्म पुणे के विशिष्ट मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था । रविन्द्र ने अनेको कठिनाइयों के बीच अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की । अब इनके सामने सबसे बड़ी चुनौती नौकरी ढूंढना था । कुछ वर्षों तक उन्होंने नौकरी ढूढने का काफी प्रयास किया लेकिन असफल रहे । लगातार प्रयास करने के कारण अंत मे इन्हें मेटाकेम नाम की एक कम्पनी में जॉब मिल ही गई । कम्पनी में नौकरी लगने के अगले वर्ष ही उनकी शादी हो गई ।

रविन्द्र जगताप(Ravindra Jagtap) भले ही नौकरी कर रहे थे लेकिन उनके मन मे कही न कही खुद की कम्पनी बनाने की एक आग दहक रही थी लेकिन उस आग को पूरा करना एक मध्यमवर्गीय परिवार के व्यक्ति के लिए बिल्कुल भी आसान नही था । रविन्द्र जब भी ऑफिस जाते तो , अक्सर सिग्नल पर एक शानदार कार में आदित्य बिड़ला (बिरला समूह के संस्थापक) को देखते थे और उनके जैसा ही बनने के सपने देखा करते थे । रविन्द्र उनसे इतने प्रभावित थे कि उन्होंने अपने नवजात बेटे का नाम आदित्य ही रख दिया । जो उन परिस्थितियों में उनके मन को सन्तुष्ट करने के लिए पर्याप्त था ।

साल 1995 रविन्द्र जगताप(Ravindra Jagtap) के जीवन का सबसे निर्णायक दौर था , जब उनकी कम्पनी के मालिक का निधन हो गया और नए प्रबंधन ने कम्पनी की एक नई दिशा में ले जाने का फैसला किया । इस फैसले के कारण रविन्द्र ने नौकरी छोड़ दी । अब उनका जीवन एक दम अस्थिर हो गया । मुम्बई जैसे शहर में बिना काम के जीवन निर्वहन करना और परिवार की जिम्मेदारियों को सम्हालना कोई आसान काम नही था । लेकिन रविन्द्र ने हार नही मानी और स्वरोजगार के क्षेत्र तलासने की खोज जारी रखी । इसी खोज के बाद उन्होंने फार्म सेक्टर में इस्तेमाल होने वाले अवयव से सम्बंधित व्यापार करेंगे ।

रविन्द्र जगताप(Ravindra Jagtap) ने 1997 में अस्ट्रीड इंटरनेशनल के बैनर के तले अपने सपने की नींव डाली । उस समय कम्पनी सिर्फ मेटफॉर्मिन एचसीएल की डील करती थी । रविन्द्र ने अन्य देशों को निर्यात करने के लिए एपीआई उत्पादों पर शोध करना शुरू किया साथ ही वे राष्ट्रीय आपूर्तिकर्ताओं और अंतर्राष्ट्रीय ग्रहको का पता लगाने के लिए पुस्तकालयों का दौरा करते थे । उस समय पत्र व्यवहार की संचार का माध्यम था और पत्र के जवाब के लिए 2 महिने का इंतजार करना पड़ता था । एक लंबे इंतजार के बाद भी रविन्द्र को किसी अंतराष्ट्रीय कम्पनी का जवाब नही मिला ।

लेकिन इन्होंने हार नही मानी और लगातार काम जारी रखा । छोटे ग्राहक से लेकर बड़े ग्राहक ढूंढे । अस्तित्व के लिए शुरू किए गए कारोबार ने प्रथम वर्ष में ही 20 लाख का व्यापार किया । आज अस्त्रिड(Aastrid) समूह का कारोबार 500 करोड़ के मूल्यांकन के पार है । हालांकि इनकी ट्रेन्डिंग विंग अभी भी चालू है और ये लगातार नये नये उत्पादों पर आज भी शोध कर रही है। महाराष्ट्र के मलाड इलाके में कम्पनी की स्वयं की विनिर्माण इकाई है । भारत , दुबई , चीन में स्वयं के कार्यालय होने के कारण कम्पनी 50 से अधिक अधिक देशों में निर्यात कर रही है । अभी कम्पनी , 50 करोड़ की लागत से एक नई इकाई पर्यावरण स्थिरता लाने के लिए ग्रीनफ़ील्ड विनिर्माण सुविधा का निर्माण शुरू किया ।

 

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